Tuesday, October 25, 2016

फेस वैल्यू क्या है

फेस वैल्यू क्या है

शेयरों के संदर्भ में यह जानना और समझना बहुत आवश्यक है कि फेस वैल्यू क्या है किसी शेयर की वैल्यूएशन अथवा बाजार भाव से इसका क्या सम्बन्ध है. यहाँ हम यह भी समझेंगे की किस तरह यदि शेयर स्प्लिट Split होता है तो इसका शेयर की फेस वैल्यू पर क्या असर पड़ता है और शेयर के स्प्लिट होने पर उसके बाजार भाव पर क्या असर पड़ सकता है. फेस वैल्यू Face Value यानी अंकित मूल्य शेयर की वास्तविक कीमत होती है जो कि शेयर प्रमाण पात्र पर अंकित रहती है. यदि अबस कंपनी की कुल शेयर पूँजी दो करोड़ रुपये है और वह दस रुपये प्रति शेयर के बीस लाख शेयर जारी करती है तो दस रुपये अबस कंपनी के शेयर की फेस वैल्यू यानी अंकित मूल्य होगी. फेस वैल्यू को पार वैल्यू Par Value या केवल पार भी कहते हैं.

अब यदि अबस कंपनी का शेयर बाजार में सूचित Listed होने के बाद मांग बढ़ने के कारण शेयर बाजार में बढ़ कर रुपये 15 हो जाता है तो अब इसे प्रीमियम वैल्यू या अबव पार Above Par कहेंगे. और यदि शेयर की बाजार कीमत घट कर आठ रुपये रह जाती है तो इसे डिस्काउंट वैल्यू Discount Value या बिलो पार Below Par  कहेंगे. दस रुपये के शेयर की कीमत यदि बाजार में भी दस रुपये ही है तो इसे एट पार At Par कहेंगे.
अक्सर शेयर खरीदते समय खरीददार शेयर की फेस वैल्यू चैक नहीं करते. ध्यान दीजिये की यदि ए कंपनी का एक रुपये फेस वैल्यू का शेयर बीस रुपये में बिक रहा है और बी कंपनी का दस रुपये फेस वैल्यू का शेयर बीस रुपये में बिक रहा है तो इसका क्या मतलब होगा? इसका मतलब यह होगा कि ए कंपनी का शेयर अपनी फेस वैल्यू से बीस गुना कीमत पर बिक रहा है और बी कंपनी का शेयर अपनी फेस वैल्यू से दो गुना कीमत पर बिक रहा है. यानि ए कंपनी का शेयर बी कंपनी के मुकाबले अधिक प्रीमियम पर बिक रहा है.
कंपनी अपने शेयर की फेस वैल्यू को बदल भी सकती है. कम्पनियां अपने शेयर को स्प्लिट Split यानी विभाजित कर उसके फेस वैल्यू को बदल सकती है. कल्पना कीजिये की यदि आपके पास अबस कंपनी के दस रुपये फेस वैल्यू के सौ शेयर हैं और उनका बाजार भाव पचास रुपये प्रति शेयर है. कंपनी अपने शेयरों को स्प्लिट करके उनकी फेस वैल्यू को पांच रुपये प्रति शेयर कर देती है. ऐसी स्थिती में कम्पनी आपके दस रुपये फेस वैल्यू वाले सौ शेयरों को पांच रुपये फेस वैल्यू के दो सौ शेयरों में परिवर्तित कर देगी. अब आपके शेयर का बाजार भाव भी कम हो कर पच्चीस रुपये प्रति शेयर के आस पास  हो जाने की संभावना है. अधिकतर स्प्लिट होने के बाद शेयरों का बाजार भाव उसी अनुपात में नहीं घटता जिस अनुपात में फेस वाले घटती है. इसीलिए संभावना है की इस उदहारण में स्प्लिट होने के बाद शेयर की बाजार कीमत पच्चीस रुपये से अधिक होगी.  अक्सर कम्पनियाँ अपने शेयरों की बाजार में कीमत बहुत अधिक हो जाने पर शेयरों को स्प्लिट करतीं हैं जिससे उनके शेयरों की कीमत छोटे निवेशकों की पहुँच में रहे और वे इन शेयरों में निवेश कर सकें.

निफ्टी क्या है

निफ्टी क्या है? 

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का सूचकांक है.  
निफ्टी नेशनल  स्टॉक एक्सचेंज पर सूचीबद्ध 50 प्रमुख शेयरों का सूचकांक है. निफ्टी दो शब्दों को मिला कर बना है NATIONAL और FIFTY. इससे यह प्रतीत होता है कि निफ्टी शब्द नेशनल स्टॉक एक्सचेंज पर सूचीबद्ध सर्वोच्च पचास शेयरों पर आधारित है. निफ्टी की चाल से आपको बाजार की चाल का हाल मालूम हो जाता है. यदि निफ्टी में तेजी है तो आप मान सकते हैं कि बाजार में भी तेजी है. यदि निफ्टी में गिरावट है तो आप मान सकते हैं कि बाजार में भी गिरावट है.  हालाँकि निफ्टी केवल पचास शेयरों की कीमत के आधार पर ही गिना जाता है फिर भी निफ्टी की दिशा बाजार की दिशा का  भी संकेत देती है.

BSE तथा NSE भारत के प्रमुख शेयर बाजार हैं जहां शेयरों की ट्रेडिंग होती है. सेंसेक्स तथा निफ्टी इनके प्रमुख सूचकांक हैं.
हमने अपनी पिछली पोस्ट Sensex  में आपको बताया था की सेंसेक्स क्या है और इसे कैसे गिनाते हैं. सेंसेक्स क्योंकि 30 शेयरों पर आधारित है और निफ्टी 50 शेयरों पर आधारित है तो हम कह सकते हैं की निफ्टी बाजार की चाल का व्यापक तरीके से प्रतिनिधित्व करता है. यह पचास शेयर 22 अलग अलग उद्योगों से लिए गए हैं.
सेंसेक्स की ही तरह निफ्टी भी मुक्त फ्लोट बाजार भारित शेयर बाजार सूचकांक (free-float market-weighted stock market index) है. किसी भी कंपनी के बाजार पूंजीकरण Market Capitalization का वह हिस्सा जो बिकने के लिए बाजार में उपलब्ध हो सकता है  वह फ्री फ्लोट बाजार पूँजी होगी और उसी के आधार पर निफ्टी की भी गणना की जाती है.
मुक्त फ्लोट बाजार भारित शेयर बाजार सूचकांक (free-float market-weighted stock market index)  में इंडेक्स की कैसे गणना की जाती है गणना का पूरा तरीका आप Sensex (पिछली पोस्ट)  पर देख सकते हैं. निफ्टी का आधार वर्ष 1995 है और आधार अंक 1000 है. इस सूचकांक की गणना 3 नवम्बर 1995 से की जाती है और इस दिन सूचकांक का आधार 1000 माना गया है.
आज यदि निफ्टी का मूल्य 8000 के करीब है, तो इसका मतलब यह है कि निफ्टी के शेयरों की कीमत  1995 के मुकाबले अब तक 800% तक बढ़ चुकी है.

बुक वैल्यू क्या है

शेयर की बुक वैल्यू क्या है और यह फेस वैल्यू  और शेयर की बाजार कीमत से कैसे अलग है और इससे  कंपनी की सेहत का कैसे पता चलता है? 

बुक वैल्यू क्या है 

 यह समझ लेना भी बहुत आवश्यक है कि किसी शेयर की बुक वैल्यू क्या है. कह सकते हैं कि शेयर की वास्तविक वैल्यू या मूल्य उसका फेस वैल्यू ना हो कर उसका बुक वैल्यू है.  शेयर खरीदने से पहले शेयर के बाजार भाव की तुलना उसकी बुक वैल्यू से अवश्य करनी चाहिए. आम तौर पर बड़ी बुक वैल्यू को कंपनी के अच्छे आर्थिक सेहत की निशानी माना जाता है.

बुक वैल्यू वास्तव में कंपनी के खातों में वह वैल्यू है जो की किसी कंपनी को यदि बेचा जाए तो उसकी संपत्तियों से देनदारियां घटा कर प्रति शेयर कितना भुगतान प्राप्त होगा. किसी शेयर की बुक वैल्यू उसकी शेयर कैपिटल और जनरल रिज़र्व के जोड़ को कुल शेयरों की संख्या से विभाजित करके भी प्राप्त किया जा सकता है.
इसे एक उदाहरण से समझते हैं. यदि अबस कंपनी के दस रुपये प्रति शेयर के एक करोड़ शेयर हैं यानी उसकी  दस करोड़ रुपये की शेयर कैपिटल से शुरुआत हुई है. अब एक साल बाद अबस कंपनी को दो करोड़ रुपये का लाभ हुआ है तो कंपनी की संपत्ति एक साल बाद बारह करोड़ रुपये हो जायेगी. उसी प्रकार दो करोड़ का लाभ (माना कंपनी ने कोई लाभांश नहीं दिया है) जनरल रिज़र्व में जुड़ जाएगा. अब शेयर कैपिटल और जनरल रिज़र्व के जोड़ यानी बारह करोड़ को जब शेयरों की संख्या यानी एक करोड़ से विभाजित करेंगे तो प्रति शेयर शेयर बुक वैल्यू बारह रुपये प्राप्त होगी. इसी प्रकार प्रति वर्ष जब कंपनी लाभ या हानी  कमाती जायेगी तो शेयर की बुक वैल्यू बढ़ती या घटती  जायेगी.
आम तौर पर शेयर बाजार में किसी शेयर की कीमत उसकी बुक वैल्यू से अधिक होती है क्योंकि निवेशक भविष्य में होने वाले लाभ की संभावना को देखते हुए शेयरों की खरीद करते हैं. कई बार यदि कंपनी प्रीमियम पर शेयर जारी करती है तो उस प्रीमियम को भी जनरल रिज़र्व में जोड़ दिया जाता है.
यदि किसी शेयर की बुक वैल्यू यदि उसके फेस वैल्यू  से बहुत अधिक है तो इसका मतलब है की कंपनी के पास जनरल रिज़र्व बहुत बड़ा है, ऐसे में उस कंपनी के बोनस शेयर जारी करने की संभावना भी हो सकती है. जनरल रिज़र्व पिछले सालों के प्रॉफिट या बेचे गए शेयरों के प्रीमियम से बनाता है.
BVPS Ratio : किसी शेयर के बाजार कीमत और बुक वैल्यू के अनुपात को BVPS Ratio कहते हैं. इससे निवेशक बाजार में शेयर के बढ़ सकने की संभावना का अंदाज लगाते हैं. BVPS यानी Book Value Per Share. इसकी गणना शेयर के बाजार भाव को शेयर की बुक वैल्यू से विभाजित करके प्राप्त की जाती है. बारह रुपये बुक वैल्यू के शेयर की कीमत यदि बाजार में चौबीस रुपये है तो उसका BVPS ratio 24/12=2 होगा.

शेयर क्या होते हैं

शेयर का अर्थ है -  अंश  यानी  हिस्सा

यदि आपके पास किसी कंपनी के शेयर है तो आप
उस कंपनी के उतने हिस्से के मालिक बन जाते हैं जितने शेयर आपके पास हैं. 

शेयर को हिंदी में अंश कहते हैं और शेयर होल्डर को अंशधारक.

 शेयर बाजार से शेयर खरीद कर आप भी वहां लिस्टेड किसी भी कंपनी के मालिक बन सकते हैं. आप जितना शेयर खरीदेंगे उस कंपनी में आप उतने ही हिस्से के मालिक बन जाएंगे. सभी शेयर कंपनी द्वारा घोषित किये गए सभी Dividend डिविडेंड अथवा Bonus Share बोनस शेयर के अधिकारी होते हैं.

किसी भी कंपनी को शुरू करने के लिए बहुत बड़ी पूंजी की आवश्यकता होती है यह बहुत कठिन है कि इतनी बड़ी पूंजी कोई एक व्यक्ति अपने पास से उस कंपनी में लगा सके यदि उस बड़ी पूंजी को छोटे-छोटे अंशों अथवा शेयरों में बांट दिया जाए तो बहुत से व्यक्ति उस कंपनी में हिस्सेदारी खरीदकर उस कंपनी के मालिक बन सकते हैं कोई भी व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार शेयर खरीद कर कंपनी के उतने ही हिस्से का मालिक बन सकता है जितनी उसकी क्षमता है. कोई भी व्यक्ति आसानी से किसी कंपनी के शेयर खरीद सके इसके लिए आवश्यक है कि वह कंपनी किसी ना किसी स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्टेड हो. एक बार यदि कोई कंपनी किसी स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड हो जाती है तो उस कंपनी के शेयरों की ट्रेडिंग स्टॉक एक्सचेंज में शुरू हो जाती है.
लिस्टिंग के बाद उस कंपनी के शेयरधारक अपने शेयर उस स्टॉक एक्सचेंज पर बेच सकते है तथा उस शेयर को खरीदने के इच्छुक व्यक्ति उस शेयर को उसी स्टॉक एक्सचेंज से खरीद सकते हैं. जब किसी कंपनी का शेयर आसानी से बिकने या खरीदने के लिए उपलब्ध रहता है तो उसे कंपनी की शेयरों की liquidity लिक्विडिटी अथवा तरलता कहा जाता है किसी भी शेयर की वास्तविक बाजार कीमत उसके फेस वैल्यू से अधिक अथवा कम हो सकती है और यह कीमत शेयर की मांग और पूर्ति पर निर्भर करती है. यह शेयर बाजार का साधारणता नियम है कि  जिस शेयर की मांग अधिक होती है उसकी कीमत बढ़ती है और जिस शेयर की मांग नहीं होती है उसे शेयर होल्डर बेचना चाहते है तो उस शेयर की कीमत घट जाती है.
जो व्यक्ति अथवा व्यत्क्तियों का समूह किसी कंपनी को शुरू करने की योजना बनाते है उन्हें प्रमोटर कहा जाता है. प्रमोटर एक हिस्सा उन शेयरों में अपने पास रखते है और बाकी हिस्सा पब्लिक को पेश किया जाता है. जो हिस्सा प्रमोटरों के पास रहता है आमतौर पर वह हिस्सा शेयर मार्केट में ट्रेड होने के लिए नहीं आता. शेयर मार्केट में वही हिस्सा ट्रेड होता है जो पब्लिक के पास होता है.
आमतौर पर शेयरों में निवेश करने वाले को निवेशक कहा जाता है मगर बहुत से लोग डे ट्रेडिंग में काम करते है. मेरे हिसाब से वास्तविक  निवेशक वाही है जो शेयर खरीदने के बाद उसे कम से कम तीन वर्ष के लिए अपने पास रखें.
डे ट्रेडिंग में शेयर को खरीदने अथवा बेचने के बाद उसी दिन सौदे को वापस कर दिया जाता है. यानी कि यदि कोई डे ट्रेडर यह सोच कर की आज Reliance इंडस्ट्रीज का शेयर बढ़ने वाला है मार्केट में ट्रेडिंग के शुरुआत में उसे खरीद लेता है और मार्केट बंद होने से पहले ही वापस बेच देता है तो उसे डे ट्रेडिंग कहेंगे.
मेरे हिसाब से डे ट्रेडिंग बहुत ही खतरनाक खेल है और एक तरह से जुआ ही है इसलिए इससे अधिकतर निवेशकों को दूर ही रहना चाहिए. हो सकता है कि जब आप किसी ब्रोकर अथवा बैंक के पास अपना ट्रेडिंग अकाउंट खोलें तो वहां का स्टाफ आपको डे ट्रेडिंग के लिए निमन्त्रित करें. आप इस बात को समझ लीजिए कि आप जितनी बार भी ट्रेडिंग करेंगे तो ब्रोकर को अपनी ब्रोकरेज मिलेगी.
जरूरी नहीं है की हर सौदे में आपको प्रॉफिट ही हो इसलिए जब भी निवेश करें लंबी अवधि के बारे में सोच कर ही निवेश करें और अपने फैसले पर विश्वास रखें. बार बार शेयरों को स्विच करना फायदेमंद नहीं होता. हर तीन से छः महीने में अपने पोर्टफोलियो का आकलन जरूर कर लें.

पी ई रेश्यो क्या है? (PE Ratio)

पी ई रेश्यो क्या है? शेयर बाजार में किस शेयर में निवेश करें यह जानने के लिए सबसे कारगर टूल है पी ई रेश्यो. .
PE Ratio Maens  Price Earning Ratio  पी ई रेश्यो यानी मूल्य आय अनुपात. किसी शेयर का  PE Ratio यानी मूल्य आय अनुपात जान कर बहुत आसानी से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि शेयर की कीमतों में बढ़ोतरी की कितनी संभावना है. इसी प्रकार पूरे बाजार का PE Ratio देख कर आप बाजार के बढ़ने की संभावनाओं का अंदाजा भी लगा सकते हैं. किसी एक उद्योग या वर्ग के शेयरों का PE Ratio देख कर भी आप यह अंदाजा लगा सकते हैं की उनमें बढ़ने की संभावना है या नहीं. 

इसी प्रकार दो शेयरों, दो उद्योगों, दो देशों के बाजारों अथवा दो वर्गों के शेयरों के बाजार भाव की तुलना करनी हो तो PE Ratio एक बहुत ही काम का टूल है. एक ही शेयर या उद्योग या बाजार की कीमतों की तुलना उनके ऐतिहासिक मूल्यों और अनुपात से भी की जाती है. इससे यह पता चलता है की कोई शेयर या बाजार पहले कितने मूल्य अनुपात तक बढ़ा या गिरा है.

PE Ratio केवल लाभ देने वाले शेयर के लिए ही गिन सकते हैं. जब आय ही नहीं हो तो मूल्य आय अनुपात नहीं निकाल सकते. आसान भाषा में समझें तो PE Ratio यह जानने का तरीका है कि कंपनी की आय का जो हिस्सा प्रति शेयर को प्राप्त होगा उसके अनुपात में शेयर की बाजार में कीमत क्या है. PE Ratio जानने के लिए सबसे पहले गिनते हैं EPS यानि प्रति शेयर आय. उसके बाद एक शेयर की कीमत से EPS को विभाजित करके PE Ratio निकाल सकते हैं.
पी ई रेश्यो =शेयर की बाजार में कीमत/प्रति शेयर आय
PE Ratio = Merket Price / EPS
अब इसे एक उदहारण से समझते हैं. मान लीजिये अबस कंपनी के दस रुपये मूल्य के 100000 शेयर हैं. कंपनी की वार्षिक आय है रुपये 2,00,000. अब शेयर का EPS होगा 2,00,000/100000 = रु 2. अब यदि शेयर का बाजार में मूल्य रु 18 है तो शेयर का PE Ratio होगा:
PE Ratio = 18/2 =9.
अब हम इस PE Ratio का उपयोग कैसे करेंगे? अबस कंपनी के शेयर के मूल्य का इतिहास देखिये. इसका अधिकतम PE Ratio कितना रहा है? इसी प्रकार अबस कंपनी जिस उद्योग में है उसका औसत PE Ratio कितना है? पूरे बाजार का औसत PE Ratio कितना है? इन सब तुलनाओं से यह अंदाज लगाना आसान हो जाता ही कि अबस कंपनी के शेयर की वर्तमान कीमत में बढ़ने या घटने की कितनी संभावना है.
यहाँ यह स्पष्ट कर दूं कि PE Ratio संकेत मात्र है और निवेश का फैसला करने में सहयोगी हैं मगर जब भी निवेश करें तो कंपनी, उसके उद्योग तथा बाजार के बारे में पूरी जानकारी लेने के बाद ही निवेश करें.
उम्मीद है कि साधारण हिंदी में लिखा PE Ratio in Hindi आपको समझ आया होगा. शेयरों में निवेश करना जुआ नहीं है, यह एक कला और विज्ञान है. जो इसे सीख लेगा वह अवश्य यहाँ कमाई करेगा.

KYC क्या है

बैंक में खाता खोलना हो, फिक्स्ड डिपाजिट बनवाना हो, म्यूच्यूअल फण्ड खरीदना हो या बीमा लेना हो, आपसे KYC फॉर्म भरवाया जाता है.
 KYC क्या है और इसे क्यों भरवाया जाता है 


KYC  यानि Know your customer को साधारण हिंदी में कहेंगे अपने ग्राहक को जानिये. बैंक तथा वित्तीय कम्पनियाँ इस फॉर्म को भरवा कर इसके साथ कुछ पहचान के प्रमाण भी लेतीं हैं जिसके जरिये वे अपने ग्राहक की पहचान की पुष्टि करते हैं. केवाईसी अपने ग्राहकों की पहचान की पुष्टि के लिए एक व्यापार की प्रक्रिया है. भारतीय रिज़र्व बैंक के द्वारा बैंकों के लिए ग्राहकों से केवाईसी भरवाना अनिवार्य किया गया है.

KYC भरवाने का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जाने या अनजाने में अपराधिक तत्व बैंकिंग प्रणाली का अनुचित प्रयोग अपनी गतिविधियों के लिए ना कर पायें.  अपराधियों द्वारा नकली पहचान और नकली पते बता कर खाता खोलने की कोई भी कोशिश केवाईसी द्वारा रोकी जा सकती है.
बैंक भी अपने ग्राहकों को KYC द्वारा बेहतर तरीके से समझ सकते हैं उनके वित्तीय लेन-देन को समझ उनकी जरूरतों को अच्छे से पूरा कर सकते हैं.  बैंक में केवाईसी के लिए ग्राहक के पहचान, नाम पते की पुष्टि करने के लिए फोटो तथा एड्रेस प्रूफ यानी पते का प्रमाण लिया जाता है.
बैंक में खाता खोलने के अलावा लोन लेने, लॉकर लेने, क्रेडिट कार्ड बनवाने, म्यूच्यूअल फण्ड खरीदने तथा बीमा आदि लेने पर KYC फॉर्म भरने की आवश्यकता पड़ सकती है. बैंक में लेन-देन  के लिए खाता खुलवाने के लिए केवाईसी फॉर्म भरना अनिवार्य है. यदि आप यह फॉर्म नहीं भरते हैं तो बैंक आपको खता खोलने से मना भी कर सकता है.
इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप केवल बचत खाता ही खोल रहे हैं और बहुत कम राशि जमा करवा रहे हैं. किसी भी बैंकिंग लेन देन के लिए केवाईसी फॉर्म भरना अनिवार्य है.

सेंसेक्स क्या है

सेंसेक्स क्या है........ और इसे कैसे गिनते हैं...... इसका स्टॉक मार्किट में क्या महत्त्व होता है

सेंसेक्स क्या है  इसे कैसे गिनते हैं?

 जब आप शेयर बाजार  में निवेश करने के बारे में सोचते हैं या उसके बारे में जानना चाहते हैं तो सबसे पहले यही सवाल सामने आता है कि यह सेंसेक्स क्या होता है और इसका शेयर बाजार  में क्या महत्त्व है? Sensex means  Sensitive Index  यानि संवेदी सूचकांक का संक्षिप्त रूप है. मुम्बई स्टाक एक्सचेंज  का संवेदी सूचकांक जिसे संक्षेप में बीएसई 30 (BSE 30) या बीएसई सेंसेक्स (BSE Sensex)  भी कहा जाता है,  वहां के सर्वोच्च 30 शेयरों पर आधारित है।

यदि आप शेयर बाजार की जानकारी लेना चाहते हैं तो यह जानना बहुत आवश्यक है कि सेंसेक्स क्या है और इसे कैसे गिना जाता है. 
यहां आपको यह बता दें कि यह 30 शेयरों की सूची समय समय पर बदलती रहती है तथा मुम्बई शेयर बाजार आवश्यक्ता के अनुसार इस सूची में बदलाव करता रहता है मगर सूचकांक में कुल शेयरों की संख्या तीस ही रहती है।
Sensex सेंसेक्स  :
एस एंड पी बीएसई सेंसेक्स (एस एंड पी बंबई स्टॉक एक्सचेंज का संवेदी सूचकांक), मुम्बई शेयर बाजार में सूचीबद्ध 30  स्थापित और आर्थिक रूप से मजबूत कंपनियों के एक मुक्त फ्लोट बाजार भारित शेयर बाजार सूचकांक (free-float market-weighted stock market index) है।  BSE में से सबसे बड़े और सबसे सक्रिय रूप से कारोबार करने वाले  शेयरों में से ऐसी  30 कंपनियों को लिया जाता है जो कि भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
1 जनवरी 1986 के बाद से प्रकाशित, एस एंड पी बीएसई सेंसेक्स भारत में घरेलू शेयर बाजारों की नाड़ी के रूप में माना जाता है। एस एंड पी बीएसई सेंसेक्स का आधार मूल्य 1 अप्रैल 1979 के दिन से 100 के रूप में लिया और 1978-1979 इसका आधार वर्ष है।
यहां आपको यह बता दें कि यह 30 शेयरों की सूची समय समय पर बदलती रहती है तथा बीएसई आवश्यक्ता के अनुसार इस सूची में बदलाव करता रहता है मगर सूचकांक में कुल शेयरों की संख्या तीस ही रहती है।
कैसे गिनते हैं सेंसेक्स :
जैसे कि मैनें बताया कि सेंसेक्स free-float market-weighted stock market index है. फ्री फ्लोट का आसान हिंदी में अर्थ होगा तैरने के लिए आजाद. किसी भी कंपनी के बाजार पूंजीकरण Market Capitalization का वह हिस्सा जो बिकने के लिए बाजार में उपलब्ध हो सकता है  वह फ्री फ्लोट बाजार पूँजी होगी और उसी के आधार पर सेंसेक्स की गणना की जाती है. आम तौर पर प्रमोटरों का हिस्सा अथवा सरकार का हिस्सा पूँजी में से निकाल दें तो बाकी बची पूँजी बाजार में बिकने के लिए उपलब्ध हो सकती है.
Market Capitalization अथवा बाजार पूंजीकरण क्या है?
इसे Market Cap या बाजार पूँजी भी कह सकते हैं. इसे कंपनी द्वारा कुल जारी शेयरों की संख्या को प्रति शेयर बाजार भाव से गुना करके प्राप्त किया जा सकता है.  यदि एक कंपनी ने  दस दस रुपये कीमत के एक लाख शेयर जारी किये हैं तो कंपनी की पूँजी हुई दस लाख रुपये. अब यदि इस कंपनी के एक शेयर की बाजार में कीमत साठ रु है तो कंपनी की Market Cap या बाजार पूँजी साठ लाख होगी.
बाजार पूँजी = कुल बकाया शेयर X प्रति शेयर बाजार भाव
1,00,000 X रु 60 = रु 60,00,000
अब यदि इस कंपनी में प्रमोटरों का हिस्सा 40 %  है और पब्लिक का हिस्सा 60%  है तो इस कंपनी में फ्री फ्लोट फैक्टर होगा 0.6 .  यानि इंडेक्स की गणना के लिए इस कंपनी के बाजार पूँजी का 60%  हिस्से का ही असर माना जाएगा.
इस प्रकार से पूरे इंडेक्स का free float market capitalization निकाला जाता है और उसे इंडेक्स विभाजक (index divisor) से विभाजित कर दिया जाता है. यह इंडेक्स विभाजक 1978-1979 के आधार वर्ष की बाजार पूँजी में हुई बढ़त पर आधारित होता है.
मान लीजिये आधार वर्ष में बाजार पूँजी थी 50000 और जिस दिन का इंडेक्स गिनना है उस दिन की बाजार पूँजी है 12000000 है तो इंडेक्स विभाजक होगा 100/50000 और इंडेक्स की गणना होगी 12000000 x 100/50000 = 24000.

मुद्रास्फीति

 मुद्रास्फीति को परिभाषित करना आसान नहीं है. Inflation यानी मुद्रास्फीति का शाब्दिक अर्थ है मुद्रा का फैलना. तकनीकी परिभाषा में ना जाकर इसको आसान भाषा में समझने की कोशिश करते हैं. मुद्रास्फीति का अर्थ इसी में छिपा है. मुद्रा यानी करेंसी और स्फीति यानी बढ़ना, फूलना या फैलना. यानी जब किसी अर्थव्यवस्था में लोगों के पास खरीदने के लिए मुद्रा बढ़ जाती है तो उस अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति का बढ़ना कहा जाएगा. यानि जब वस्तुओं की मांग (Demand) बढ़ती है और उसी के अनुसार वस्तुओं की पूर्ती (Supply) नहीं बढ़ती है तो उस स्थिती को  मुद्रास्फीति का बढ़ना कहा जाएगा.

मुद्रास्फीति क्या है
आइये इसे आसान उदाहरण से समझते हैं. मान लीजिये एक अर्थव्यवस्था में सब लोगों के पास एक हजार रुपये हैं. वे इसी से एक दूसरे से सामान खरीदते और बेचते हैं. अब यदि इस अर्थव्यवस्था में किसी कारण से एक सौ रुपये और आ जाते हैं और अन्य परिस्थितियाँ नहीं बदलती हैं . अब इस अर्थव्यवस्था में कुल ग्यारह सौ रुपये हो गए. अब वह अतिरिक्त सौ रुपये जो लोगों की जेब में आ गए वे उसके लिए भी मांग (Demand) पैदा करेंगे. इसी मांग के अनुसार पूर्ती (Supply) नहीं बढ़ने के कारण वस्तुओं की कीमतें बढेंगी. इसी वस्तुओं को बढ़ने की गणना को मुद्रास्फीति कहा जाता है.
मुद्रास्फीति के कारण
मुख्य रूप से मुद्रास्फीति के दो कारण हो सकते  हैं.
मांग जन्य मुद्रास्फीति: जब लोगों के पास खर्च करने के लिए अधिक पैसा हो जाता है और वस्तुओं की मांग बढ़ जाते है तो उसके फलस्वरूप बढ़ी कीमतें.
  • सरकारी खर्चों में वृद्धि : सरकार द्वारा गैर योजना व्यय में वृद्धि से जनता के हाथों में व्यय करने के लिए अधिक धन आ जाता है जिससे मांग में वृद्धि होती है.
  • सरकार द्वारा घाटे का बजट :  घाटे के बजट की पूर्ती जब सरकार द्वारा नयी मुद्रा छाप कर की जाती है तो ऐसे में मांग में वृद्धि मुद्रास्फीति को बढ़ाती है.
  • सरकार द्वारा प्रत्यक्ष करों में कमी: यदि सरकार प्रत्यक्ष करों में कमी करती है तो भी लोगों के पास खर्च के लिए हाथ में अधिक धन आ जाता है. यह भी मांग को बढाता है.
  • बैंकों द्वारा ऋण : यदि बैंकों द्वारा दिए जाने वाले ऋण में वृद्धि होती है तो भी मांग में वृद्धि होने लगाती है.
पूर्ती में कमी के कारण मुद्रास्फीति: जब सामान्य वस्तुओं की पूर्ती में प्राकृतिक या जानबूझ कर कमी पैदा हो जाती है तो यह मुद्रास्फीति के बढ़ने का कारण बनती है.
  • जमाखोरी : उत्पादन में उतार चढाव के कारण व्यापारियों को जमाखोरी का अवसर मिल जाता है जिसे वस्तुओं की पूर्ती  में नकली कमी पैदा की जाती है.
  • प्राकृतिक आपदा : बाढ़ अथवा सूखे के कारण कृषि उत्पादों की पूर्ती में कमी आ सकती है.
  • लागत में बढ़ोतरी : वस्तुओं के कच्चे माल, मजदूरी की कीमतों में बढ़ोतरी, अधिक टैक्स या ब्याज में बढ़ोतरी जैसी चीजें भी पूर्ती में बाधा उत्पन्न कर सकती है.
मुद्रास्फीति कैसे गिनते हैं
इसे भी आसानी से समझते हैं. मान लीजिये आज से ठीक एक साल पहले आपने एक कमीज सौ रुपये में खरीदी. आज यदि उस कमीज की कीमत एक सौ पांच रुपये हो गयी है तो उस कमीज के लिए मुद्रा स्फीति पांच प्रतिशत बढ़ गयी. भारत में मुद्रास्फीती का नापने के लिए दो मूल्य सूचकाँक है थोक मूल्य सूचकांक (Wholesale Price Index) तथा औद्योगिक श्रमिक हेतु उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (Consumer Price Index). इन सूचकांको की गणना के लिए आम जरूरत की लगभग सभी वस्तुओं की कीमत को लिया जाता है जिनमें शामिल हैं भोज्य पदार्थ, खनिज, बिजली, इंधन, यातायात, चमड़ा, कागज़, लकड़ी, रबर जैसी सैंकड़ों वस्तुओं की कीमतें. जरुरी सामान की लिस्ट को समय के अनुसार  बदला भी जाता है. उदहारण के लिए टाइपराइटर और वीसीआर जैसी वस्तुओं को हटा कर माइक्रोवेव ओवेन, मिनरल वाटर, कंप्यूटर, फ्रिज, डिश ऐन्टेना जैसी वस्तुओं को शामिल करना.
आम तौर पर मुद्रास्फीति की हालत का प्रभाव गरीब और आय पेशा लोगों पर अधिक पड़ता है. मुद्रास्फीति की हालत में आपके द्वारा किया गया निवेश यदि आपको मुद्रास्फीति की दर से अधिक रिटर्न नहीं देता है तो आपको अपने निवेश में वास्तव में घाटा ही हुआ है.

डीमैट क्या है

डीमैट क्या है, कैसे काम करता है, डीमैट की आवश्यकता क्यों पड़ती है और इसके क्या क्या फायदे हैं 



डीमैट क्या है

 इसको आसानी से ऐसे समझिये. जैसे हम अपने  पैसे अपने बैंक के खाते में रखते हैं वैसे ही हम अपने शेयर डीमैट खाते में रखते हैं. जैसे हम यदि बैंक के खाते से नकदी निकलवा लें तो वह नकदी या करंसी पैसे का भौतिक रूप है. मगर जब हम अपने डेबिट कार्ड से किसी दूकानदार को पेमेंट करते हैं तो यह पैसों का इलेक्ट्रॉनिक ट्रान्सफर हुआ. 
इसी प्रकार यदि हमारे पास शेयर हैं तो हम या तो उन्हें किसी को गिफ्ट देंगे या बाजार में बेच देंगे, दोनों ही परिस्थितियों में शेयरों का एक डीमैट खाते से दूसरे डीमैट खाते में इलेक्ट्रॉनिक ट्रान्सफर किया जाएगा. शेयरों को भौतिक रूप में रखने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती.

भारत में शेयर और प्रतिभूतियां को इलेक्ट्रॉनिक रूप से Dematerialized डिमैटीरिलाईज्ड यानी डीमैट खातों में रखा जाता है. शेयर धारक शेयरों को भौतिक रूप में यानी कागज़ पर छपे हुए शेयर सर्टिफिकेट नहीं रखते. इसके लिए ब्रोकर के पास जा कर डीमैट खाता खुलवाया जाता है. सभी शेयरों के लेनदेन में डीमैट खाते का नंबर लिखा जाता है जिससे कि शेयरों की खरीद बिक्री का इलेक्ट्रॉनिक सेटलमेंट हो सके. किसी भी तरह के शेयरों के लेनदेन के लिए शेयर होल्डर के पास डीमैट खाता होना आवश्यक है.
डीमैट खाते तक पहुँचने के लिए इन्टरनेट पर पासवर्ड की जरूरत होती है. शेयरों की खरीद और बिक्री सौदा कन्फर्म होने पर स्वत ही हो जाती है.
जब भी कोई कंपनी बोनस अथवा राईट शेयर जाती कराती है तो ये शेयर भी सीधे शेयर होल्डर के डीमैट खाते में आ जाते हैं. आईपीओ IPO में शेयरों के आवेदन करने के लिए भी डीमैट खाते की आवश्यकता है. यदि आईपीओ में आपको शेयर मिले हैं तो वे सीधे आपके डीमैट खाते में ही आ जाते हैं.
Demat के फायदे
डीमैट शेयर गुम नहीं होते, खराब नहीं हो सकते, चोरी नहीं हो सकते. इनसे सिग्नेचर ना मिलने जैसी समस्या भी नहीं होती. डीमैट खातों की वजह से शेयरों की खरीद बिक्री में धोखा होने की संभावना भी समाप्त हो जाती है. यह बहुत ही सुविधाजनक भी है.
आप अपना डीमैट खाता किसी दूसरे को ट्रान्सफर नहीं कर सकते मगर इसमें पड़े शेयर दूसरे को ट्रान्सफर कर सकते हैं. डीमैट खाता किसी दूसरे के साथ जॉइंट तरीके से खुलवाया जा सकता है. आप एक से अधिक डीमैट खाते भी खोल सकते हैं. अधिकतर निजी बैंक आपको डीमैट खाता खुलवाने की सुविधा देते हैं. इसके अलावा कई निजी ब्रोकर कंपनियों के पास डीमैट खाता खुलवाया जा सकता है. इसके लिए आपको अपना पैन कार्ड की कॉपी, पते का प्रूफ देना होता है और KYC भरना पड़ता है.

शेयर बाजार को.................जानें

शेयर बाजार  या शेयर मार्किट में पैसा बनाना बहुत आसान है उसी प्रकार शेयर बाजार में पैसा खोना भी बहुत आसान है। इससे बचा जा सकता है अगर आप स्वंय शेयर बाजार के बारे में अधिक से अधिक जानकारी एकत्र करें,शोध करें और दूसरों के दिये टिप्स पर न जायें। शेयर बाजार एक खतरनाक खेल है, इसमें कूदने से पहले इसके बारे में अधिक से अधिक जानकारी ले लेना बहुत आवश्यक है। मगर इसका मतलब यह बिलकुल नहीं है कि शेयर मार्किट में निवेश करने के लिए कोई अलग तरह की प्रतिभा या योग्यता ही चाहिए. कोई भी कोशिश करके शेयर बाजार की जानकारी ले सकता है

आसान हिंदी में शेयर मार्किट की जानकारी मिलना कठिन होता है. शेयर मार्किट की जानकारी केवल कुछ लोगों तक ही सिमित क्यों रहे?  यहां आपको कोई विशेष शेयरों के बारे में मैं टिप्स नहीं देने वाला हूं मगर आपको शेयर बाजार के तकनीकी पहलुओं से हिंदी में अवगत करने की कोशिश करुंगा।
शेयर बाजार के अलावा मैं आपको यहाँ हिंदी में बताऊंगा बीमा, निवेश और म्यूच्यूअल फण्ड के बारे में भी. इसके आलावा जानिये टैक्स बचाने के तरीके. साथ ही पैसा बचाने के तरीके और फाइनेंस जगत की तमाम छोटी बड़ी जानकारियाँ हिंदी में.
 यहां जानिये कैसे आप किसी भी कम्पनी  में हिस्सेदार बन सकते हैं। क्या होते हैं राईट और बोनस शेयर। कैसे पढ़ें कंपनियों के तिमाही, छमाही और वार्षिक नतीजे। क्या होता है EPS और क्या होता है PE रेश्यो  और इसका शेयर की कीमत पर क्या असर होता है।
साथ ही जानिये कि किस तरह निवेश को डाइवर्सिफाई करके निवेश के रिस्क को कम किया जा सकता है. निवेश के लिए कंपनी कैसे चुन सकते हैं. किस तरीके से निवेश को डाइवर्सिफाई कर सकते हैं. लार्ज कैप, मिड कैप और स्माल कैप कम्पनियों में निवेश का क्या नजरिया होना चाहिए. हेजिंग क्या है और इससे शेयर बाजार में निवेश के रिस्क को कैसे कम किया जाता है. फ्यूचर और ऑप्शन्स क्या हैं यह भी समझने की कोशिश करेंगे.
शेयरों की फेस वैल्यू और बुक वैल्यू में क्या फर्क है? शेयर कैसे खरीदे जाते हैं? म्यूचुअल फंड कितने प्रकार के होते हैं. ETF क्या होता है? NAV क्या होता है और इसकी गणना कैसे करते हैं? सेंसेक्स और निफ्टी क्या होते हैं और इनकी गणना कैसी की जाती है. 

 इसी प्रकार के और बहुत सारे  तकनीकि पहलुओं की जानकारी के बारे में हम जानेंगें। 

शेयर बाजार क्या है और कैसे काम करता है

शेयर बाजार क्या है और शेयर बाजार कैसे काम करता है, शेयर कैसे खरीदें .............

 हिंदी में विस्तार से जानिए ....

जब भी हम किसी बाज़ार की कल्पना करते है तो हमारे दिमाग में किसी ऐसी जगह की इमेज बनती है
जहाँ बहुत-सी दुकानें होंगी या कोई मॉल जहां जाकर आप खरीदारी कर सकते हैं मगर शेयर बाजार ऐसा
बाजार नहीं है. शेयर बाजार में खरीदने और बेचने का काम पूरी तरह से कंप्यूटर द्वारा ऑटोमेटिक तरीके से होता है. कोई भी शेयर खरीदने या बेचने वाला अपने ब्रोकर के द्वारा एक्सचेंज  पर अपना आर्डर  देता है
और पलक झपकते ही पेंडिंग आर्डरों के अनुसार ऑटोमेटिकली सौदे का मिलान हो जाता है.

शेयर बाजार में काम के घंटों में ब्रोकर अपने ग्राहकों के लिए उनके द्वारा दिए गए आर्डर टर्मिनल में
डाल देते हैं.  इसके बदले में ब्रोकर को ब्रोकरेज या दलाली मिलती है.
हम कह सकते हैं कि मुख्यतः  शेयर बाजार की तीन कड़ियाँ हैं स्टॉक एक्सचेंज, ब्रोकर और निवेशक.
ब्रोकर स्टॉक एक्सचेंज के सदस्य होते है और केवल वे ही उस स्टॉक एक्सचेंज में ट्रेडिंग कर सकते हैं. ग्राहक सीधे जाकर शेयर खरीद या बेच नहीं सकते उन्हें केवल ब्रोकर के जरिए ही जाना पड़ता है.
देश में मुख्यतः  BSE यानी मुंबई स्टॉक एक्सचेंज और NSE यानी नेशनल स्टॉक एक्सचेंज हैं जिन पर
शेयरों का कारोबार होता है. अधिकतर कंपनियां जिनके शेयर मार्केट में ट्रेड होते हैं इन दोनों स्टॉक
एक्सचेंज पर लिस्टेड है मगर यह भी हो सकता है की कोई कंपनी इन दोनों में से किसी एक ही एक्सचेंज पर लिस्टेड हों.
देश के मुख्यता सभी बड़े बैंक या उनकी सबसिडी कंपनियां और अन्य बड़ी वित्तीय कंपनियां इन एक्सचेंजों में ब्रोकर के तौर पर काम करती हैं.
ग्राहक इन ब्रोकर कम्पनियों के पास जाकर अपने डीमैट अकाउंट की जानकारी देकर अपना खाता
ब्रोकर के पास खुलवा सकता है.  इस प्रकार ग्राहक का डीमैट एकाउंट ब्रोकर के अकाउंट से जुड़ जाता है
और खरीदी अथवा बेची गई शेयर्स ग्राहक के डीमैट अकाउंट से ट्रांसफर हो जाती हैं.  इसी प्रकार ग्राहक
अपना बैंक खाता भी ब्रोकर के खाते के साथ जोड़ सकता है जिससे खरीदे अथवा बेचे गए शेयरों की
धनराशि ग्राहक के खाते में ट्रांसफर की जाती है. ग्राहक द्वारा खरीदे गए शेयर इलेक्ट्रॉनिक रूप में उसके
डीमैट एकाउंट में पड़े रहते हैं जब भी कोई कंपनी डिविडेंड की घोषणा करती है तो डीमैट अकाउंट से जुड़े
बैंक खाते में डिविडेंड की राशि पहुंच जाती है. इसी प्रकार यदि कंपनी बोनस शेयरों की घोषणा करती है तो बोनस शेयर भी शेयरहोल्डर के डीमैट अकाउंट में पहुंच जाते हैं. ग्राहक जब शेयर बेचता है तो उसी डीमैट अकाउंट से वह शेयर ट्रान्सफर हो जाता है.
शेयरों में कारोबार करने के लिए एक निवेशक के पास डीमैट अकाउंट, ब्रोकर के पास ट्रेडिंग अकाउंट और
उससे जुडा एक बैंक खाता होना जरूरी है. कई बैंक इसके लिए थ्री इन वन खाता खोलने की सुविधा भी देते हैं.
अधिकतर ब्रोकर हाउस आपको ऑनलाइन शेयर ट्रेडिंग की सुविधा भी प्रदान करते हैं इसके अलावा आप फोन करके भी अपने ऑर्डर दे सकते है.
यदि आप भी शेयर बाजार में निवेश करना चाहते हैं तो शेयर बाजार क्या है और शेयर बाजार कैसे काम करता है यह आपके लिए   समझना बहुत आवश्यक है.

घर में जलाये तेजपत्ता और पाए शारीरिक व मानशिक ऊर्जा

आदरणीय पाठक गण ,
आज हम आपको बताने जा रहे है की हम आयुर्वेद को अपना कर  व समझ कर हम  हमारी सनातन संस्कृति का हिस्सा बन सकते है तथा अपने जीवन व पर्यावरण को फायदा दे सकते है।  

तेज पत्ता... 
जी हां यह वही पत्ता है जिसके बारे में आपने अपनी मां से काफी दफा सुन रखा होगा। यह पत्ता खाना बनाते समय काम आता है और कई सब्जियों में डाला जाता है। यह सब्जियों का स्वाद दुगुना कर देता है। लेकिन केवल इसी काम नहीं आता तेज पत्ता।
अगर आप एक तेज पत्ता लेकर उसे अपने कमरे में जलाएंगे, तो आपको इसके अन्य फायदों के बारे में पता चलेगा।
अपने कमरे या घर को खुशबूदार बनाए रखने के लिए लोग तरह-तरह के रूम फ्रेशनर लेकर आते हैं। महंगे इत्र भी छिड़काते हैं, लेकिन इन सभी का काम तेज पत्ता भी कर सकता है।
यकीन मानिए, इसे जलाने पर जो महक आपको मिलेगी वो कई रूम प्रेशनर से बेहतर होगी। तेज पत्ता को एक बेहतरीन रूम प्रेशनर के गुण से भी जाना जाता है।
प्राचीन समय से ही तेज पत्ते का प्रयोग इस एक कारण की वजह से भी हुआ है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि तेज पत्ता केवल खुशबू ही नहीं देता, इसे जलाने पर मिलने वाली गंध से दिमाग शांत रहता है।

तेज पत्ता आसपास के वातावरण में मौजूद दूषित कणों को काटता है। अगर आप बेहद परेशान हैं और किसी चिंता में हैं, तो एक तेज पत्ता जलाएं, कुछ ही देर में यह आपके दिमाग की सारी टेंशन भगा देगा।
तेज पत्ते को जलाने से व्यक्ति की थकान दूर होती है, दिमाग शांत रहता है, दिमाग की नसों को आराम मिलता है, इतना ही नहीं इसका धुंआ जब सांस के माध्यम से हमारे अंदर जाता है तो हमारे प्रतिरक्षी तंत्र (इम्यून सिस्टम) को मजबूत बनाता है।